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हंगामा क्युं है बरपा – गुलाम अली

स्वर – गुलाम अली

शायर – अकबर इलाहाबादी

 

मैं तेरी मस्तनिगाही का भरम रख लुंगा
होश आया तो भी कह दूंगा कि मुझे होश नहीं

हंगामा क्युं है बरपा थोडी सी जो पी है
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है

उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना
मकसुद है उस  मय से दिल ही मे जो खिंचती है

सूरज में लगे धब्बा फितरत के करिश्में हैं
बुत हमको कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है

नातजुर्बाकारी से वाईझ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर सांस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है

हम तेरे शहर में आये हैं – गुलाम अली

स्वर – गुलाम अली

शायर – कैसर अल जाफरी

हम तेरे शहर में आये हैं मुसाफिर की तरह
सिर्फ एकबार मुलाकात का मौका दे दे

मेरी मज़िल है कहाँ मेरा ठिकाना है कहाँ
सुबह तक तुज़ से बिछड कर मुझे जाना है कहाँ
सोचने के लिये एक रात का मौका दे दे

अपनी आंखोँ में छुपा रखे हैं जुगनु मैंने
अपनी पलकों पे सजा रखे हैं आंसु मैने
मेरी आंखोँ को भी बरसने का मौका दे दे

आज की रात मेरा दर्द-ए-मुहब्बत सुन ले
कपकपाते हुए होठों के शिकायत सुन ले
आज इझहार-ए-खयालात का मौका दे दे

भुलना था तो ये इकरार किया ही क्युं था
बेवफा तुने मुझे प्यार किया ही क्युं था
सिर्फ दो – चार सवालात का मौका दे दे

चुपके चुपके रात दिन – गुलाम अली

स्वर – गुलाम अली  

शायर – हसरत मोहानी

चुपके चुपके रात दिन आँसु बहाना याद है
हमको अबतक आशिकी का वो झमाना याद है

तुझ से मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा
और तेरा दांतों में युँ उंगली दबाना याद है

खेंच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ्फतन
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है

बा हझारा इस्तिराबो सद हझारा इश्तियाक्
तुझसे वो पहले पहल दिल का लगाना याद है

देखना मुझको जो परगश्ता तो सौ सौ नाझ से
जब मना लेना तो फिर वो रुठ जाना याद है

बेरुखी के साथ सुनना दर्दे दिल की दास्ताँ
वो कलाई में तेरा कंगन घुमाना याद है

वक्ते रुखसत अलविदा का लफ्झ कहने के लिये
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये
वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे फिराक
वो तेरा रो रो के भी मुझको रुलाना याद है

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