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तो अच्छा था – जगजित सिंघ

स्वर : जगजित सिंघ
शायर : मजाज़ लखनवी (असरार-उल-हक़)

हिजाब-ए-फितना परवर अब उठा लेती तो अच्छा था
खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था

तेरी नीची नझर खुद तेरी इस्मत की मुहाफिज़ है
तु इस नश्तर की तेझी आज़मा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे का टिका मर्द की किस्मत का तारा है
अगर तु साझ ये बेदारी उठा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खुब है लेकिन
तुम इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था

अगर खिलवत में तुने सर उठाया भी तो क्या हासिल
भरी महफिल में आकर सर झुका लेती तो अच्छा था

दिल-ए-मज़रूह तो मज़रूहतर करने से क्या हासिल
तु आंसु पोंछकर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था

एक नजर देख के – जगजित – चित्रा सिंघ

स्वर : जगजित चित्रा सिंघ
शायर :

एक नजर देख के हम जान गये
आप क्या चीझ हैं पहचान गये

फिर भे जिंदा हुं अजब बात है ये
कब से हो लेके मेरी जान गये

तुम जो आये तो भरी महफिल में
दिल गये हाथ से इमान गये

जिस जगह पर ना फरिश्ते पहुंचे
उस जगह आज के इन्सान गये

चिठ्ठी ना कोई संदेस जाने वो कौन सा देस – जगजित सिंघ

स्वर : जगजित सिंघ
गीतकार : आनंद बक्षी

चिठ्ठी ना कोई संदेस जाने वो कौन सा देस
जहाँ तुम चले गये
इस दिल पे लगाकर ठेस जाने वो कौन सा देश
जहाँ तुम चले गये

एक आह भरी होगी, हमने ना सुनी होगी
जाते जाते तुमने आवाझ तो दी होगी
हर वक़्त यही है गम, उस वक़्त कहाँ थे हम
कहां तुम चले गये

हर चीज पे अश्कों से लिखा है तुम्हारा नाम
ये रस्ते, घर, गलियाँ तुम्हे कर ना सके सलाम
हाय दिल में रह गई बात, जल्दी से छुडाकर हाथ
कहाँ तुम चले गये

अब यादोँ के कांटे इस दिल में चुभते हैं
ना दर्द ठहरता है ना आंसु रुकते हैं
तुम्हें ढुँढ रहा है प्यार, हम कैसे करें ईकरार
कि हाँ तुम चले गये

ये हकीकत तो निगाहोँ से – जगजित सिंघ

स्वर : जगजित सिंघ
शायर : साहिर होशीयारपुरी

ये हकीकत तो निगाहोँ से बयाँ होती है
कौन कहेता है मुहब्बत की जुबाँ होती है

वो न आयेँ तो सताती है खलिश सी दिल को
वो जो आयें तो खलिश और जवाँ होती है

ये हकीकत तो….

जिंदगी ये तो सुलगती सी चिता है ‘साहिर’
शोला बनती है न ये बुझ के धुआँ होती है

ये हकीकत तो…

कभी युँ भी तो हो – जगजित सिंघ

स्वर   –   जगजित सिंघ
शायर  –  जावेद अख्तर

कभी युँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो, पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

परियोँ की महफिल हो कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

ये नर्म मुलायम ठंडी हवाएँ जब घर से तुम्हारे गुझरे
तुम्हारी खुश्बु चुराये मेरे घर ले आए
कभी युँ भी तो हो

सूनी हर महफिल हो, कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

ये बादल ऐसा टूटकर बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को तुम्हारा दिल भी
तरसे तुम निकलो घर से

तन्हाई हो दिल हो बून्दें हो बरसात हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

कभी युँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो, पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

कैसे सुकुन पाउं तुझे देखने के बाद – तलत अझीझ

स्वर  :  तलत अझीझ
शायर  :   सईद शाहीदि
संगीतकार  :  जगजित सिंघ

कैसे सुकुन पाउं तुझे देखने के बाद
अब क्या गझल सुनाउं तुझे देखने के बाद

आवाझ दे रही है मेरी जिंदगी मुझे
जाउं मैं या न जाउं तुझे देखने के बाद

काबे का एहतराम भी मेरी नजर में है
सर किस तरफ जुकाउं तुझे देखने के बाद

तेरी निगाह-ए-मस्त ने मखनुन कर दिया
क्या मयकदे को जाउं तुझे देखने के बाद

नझरों में ताब-ए-दीद ही बाकी नहीं रही
किससे नजर मिलाउं तुझे देखने के बाद

हाथ छूटे भी तो – जगजित सिंघ

स्वर : जगजित सिंघ
शायर : गुलज़ार  

 

 

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते
वक्त की शाख से पत्ते नहीं टूटा करते

जिसकी आवाज में सिलवट हो निगाहोँ में शिकन 
ऐसी तस्वीर के टुकडे नहीं जोडा करते

शहद जिने का मिला करता है थोडा थोडा
जानेवालों के लिये दिल नहीं तोडा करते

लगके साहिल से जो बहता है उसे बह जाने दो
ऐसे दरिया का कभी रुख नहीं मोडा करते

कोई समजेगा क्या – जगजित चित्रा सिंघ

स्वर : जगजित चित्रा सिंघ
शायर  :                   

कोई समजेगा क्या राझ-ए-गुलशन
जबतक उलझे ना कांटोँ से दामन

यक ब यक सामने आना जाना
रुक ना जाये कहीं दिल की धडकन

गुल तो गुलखार तक फिर जिये हैं
फिर भी खाली है कुचे का दामन

कितनी आराईशें आशियाना
टुट जाये ना शाख-ए-नशेमन

बडी नाजूक हैं ये मंझिल – जगजित सिंघ

शायर : झमीर काझमी
स्वर : जगजित सिंघ

 

बडी नाजूक हैं ये मंझिल, मोहब्बत का सफर हैं
धडक आहिस्ता से ऐ दिल, मोहब्बत का सफर हैं

कोई सून ले ना ये किस्सा, बहोत डर लगता हैं
मगर डरने से क्या हासिल, मोहब्बत का सफर हैं

बताना भी नहीं आसान, छुपाना भी कठीन हैं
खुदाया किस कदर मुश्किल, मोहब्बत का सफर हैं

उजाले दिल के फैले हैं, चले आओ ना जानम
बहोत ही प्यार के काबिल, मोहब्बत का सफर हैं

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