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होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा

रचना: कैफ़ी आज़मी
स्वर: भूपिन्दर, रफ़ी, तलत महमूद और मन्ना डे

होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा
ज़हर चुपके से दवा जानके खाया होगा

दिल ने ऐसे भी कुछ अफ़साने सुनाए होंगे
अश्क़ आँखों ने पिये और न बहाए होंगे
बन्द कमरे में जो खत मेरे जलाए होंगे
एक इक हर्फ़ जबीं पर उभर आया होगा

उसने घबराके नज़र लाख बचाई होगी
दिल की लुटती हुई दुनिया नज़र आई होगी
मेज़ से जब मेरी तस्वीर हटाई होगी
हर तरफ़ मुझको तड़पता हुआ पाया होगा

छेड़ की बात पे अरमाँ मचल आए होंगे
ग़म दिखावे की हँसी में उबल आए होंगे
नाम पर मेरे जब आँसू निकल आए होंगे
सर न काँधे से सहेली के उठाया होगा

ज़ुल्फ़ ज़िद करके किसी ने जो बनाई होगी
और भी ग़म की घटा मुखड़े पे छाई होगी
बिजली नज़रों ने कई दिन न गिराई होगी
रँग चहरे पे कई रोज़ न आया होगा

तेरी तो चाँद सितारों में बात होती है – मोहम्मद रफी

संगीत : ईकबाल कुरेशी
गज़ल : मुज़फ्फर शाहजहाँनपुर
राग : भैरवी

तेरी तो चाँद सितारों में बात होती है
चमन चमन में बहारों में बात होती है

तेरे शबाब को देखा शराब छूट गई
यही शराब के मारों से बात होती है

सितम वो करते हैं जिस पर बडी तवज्जो से
ये उससे उनके मुकद्दर की बात होती है

मेरे जुनून से वो शोहरत है तेरे जलवों की
जिधर भी जाओ हजारों में बात होती है

मेरे लिये तो बस वही पल हैं – मोहम्मद रफी

स्वर : मोहम्मद रफी
शायर :

मेरे लिये तो बस वही पल हैं हसीं बहार के
तुम सामने बैठी रहो मैं गीत गाऊँ प्यार के
मैं गीत गाऊँ प्यार के

मैं जानता हूँ प्यार की पूजा यहाँ अपराध है
अपराध ये हर पल करूँ मन में यही इक साध है
मन में यही इक साध है
मुझको मिली है ये ख़ुशी जीवन की बाज़ी हार के
तुम सामने बैठी रहो मैं गीत गाऊँ प्यार के
मैं गीत गाऊँ प्यार के

सीखा नहीं मैने कभी संयम से मन को बांधना
है साधना मेरी तुम्हारे रूप की आराधना
रूप की आराधना
तुम साथ दो तो तोड़ दूँ सारे नियम संसार के
तुम सामने बैठी रहो मैं गीत गाऊँ प्यार के
मैं गीत गाऊँ प्यार के

एक ही बात ज़माने की – मोहम्मद रफी

स्वर : मोहम्मद रफी
शायर : सुदर्शन फकीर

एक ही बात ज़माने की किताबों में नहीं
जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है शराबों में नहीं

हुस्न की भीख न मांगेंगे न जलवों की कभी
हम फकीरों से मिलो खुल के हिजाबों में नहीं

हर जगह बीते हैं आवारा खयालों की तरह
ये अलग बात है हम आपके ख्वाबों में नहीं

न डूबो सागर-ओ-मीना में ये गम ए ‘फकीर’
के मकाम इनका  दिलों में हैं शराबों में नहीं

जीने का राझ मैंने – मोहम्मद रफी

स्वर  :  मोहम्मद रफी
शायर  :  मुझफ्फर शाहजहाँनपुर 

जीने का राझ मैंने मुहब्बत में पा लिया
जिसका भी गम हुआ उसे अपना बना लिया

तुम गम का बोज रोके भी हलका न कर सके
मैंने हँसी की आड में हर गम छुपा लिया

सुनने को जब न कोई मिला दास्तान-ए-गम
आईना रख के सामने खुद को सुना लिया

हमको मिटा सके वो – मोहम्मद रफी

स्वर : मोहम्मद रफी

शायर : जिगर मुरादाबादी

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हमसे ज़माना खुद है, ज़माने से हम नहीं

मेरी ज़ुबाँ पे शिकवा-ए-अहले-सितम नहीं
मुझको जगा दिया यही अहसान कम नहीं

या रब ! हुजुम-ए-दर को दे और वुसअतें 
दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं

शिकवा तो ये एक छेड है लेकिन हकीकतन
तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं

बेफायदा अलम नहीं, बेकार गम नहीं
तौफिक़ दे खुदा तो ये ने’मत भी कम नहीं

ज़ाहिद कुछ और हो न हो मयखाने में मगर
क्या कम ये है कि शिकवा-ए-दैर-ओ-हरम नहीं

मर्ग-ए-जिगर पे क्यों तेरी आँखें है अश्क़-रेज़
इक सानिहा सही मगर इतनी अहम नहीं

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