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एक ही बात ज़माने की – मोहम्मद रफी

स्वर : मोहम्मद रफी
शायर : सुदर्शन फकीर

एक ही बात ज़माने की किताबों में नहीं
जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है शराबों में नहीं

हुस्न की भीख न मांगेंगे न जलवों की कभी
हम फकीरों से मिलो खुल के हिजाबों में नहीं

हर जगह बीते हैं आवारा खयालों की तरह
ये अलग बात है हम आपके ख्वाबों में नहीं

न डूबो सागर-ओ-मीना में ये गम ए ‘फकीर’
के मकाम इनका  दिलों में हैं शराबों में नहीं

मयकदे बंद करें – हरिहरन

स्वर : हरिहरन
शायर :

मयकदे बंद करें लाख झमाने वाले
शहर में कम नहीं आँखों से पिलानेवाले

काश मुजको भी लगा ले कभी सीने से
मेरी तसवीर को सीने से लगानेवाले

हमने यकीन आपके वादे पे भला कैसे करें
आप हरगिझ नहीं हैं वादा निभानेवाले

अपने एबों पे नजर जिनकी नहीं होती है
आईना उनको दिखाते हैं ज़मानेवाले

शम्मा जलाये रखना – भुपिन्दर & मिताली सिंघ

स्वर : भुपिन्दर & मिताली सिंघ
शायर : सईद राही

शम्मा जलाये रखना जब तक कि मैं ना आउं
खुद को बचाये रखना जा तक कि मैं ना आउं

जिंदा दिलों से दुनिया जिन्दा सदा रही है
महफिल सजाये रखना जब तक कि मैं ना आउं

ये वक़्त-ए-इम्तिहान हैं सब्र-ओ-करार-ओ-दिल का
आँसु छुपाये रखना जब तक कि मैं ना आउं

हम तुम मिलेंगे ऐसे जैसे जुदा नहीं थे
सांसे बचाये रखना जब तक कि मैं ना आउं

तो अच्छा था – जगजित सिंघ

स्वर : जगजित सिंघ
शायर : मजाज़ लखनवी (असरार-उल-हक़)

हिजाब-ए-फितना परवर अब उठा लेती तो अच्छा था
खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था

तेरी नीची नझर खुद तेरी इस्मत की मुहाफिज़ है
तु इस नश्तर की तेझी आज़मा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे का टिका मर्द की किस्मत का तारा है
अगर तु साझ ये बेदारी उठा लेती तो अच्छा था

तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खुब है लेकिन
तुम इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था

अगर खिलवत में तुने सर उठाया भी तो क्या हासिल
भरी महफिल में आकर सर झुका लेती तो अच्छा था

दिल-ए-मज़रूह तो मज़रूहतर करने से क्या हासिल
तु आंसु पोंछकर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था

एक नजर देख के – जगजित – चित्रा सिंघ

स्वर : जगजित चित्रा सिंघ
शायर :

एक नजर देख के हम जान गये
आप क्या चीझ हैं पहचान गये

फिर भे जिंदा हुं अजब बात है ये
कब से हो लेके मेरी जान गये

तुम जो आये तो भरी महफिल में
दिल गये हाथ से इमान गये

जिस जगह पर ना फरिश्ते पहुंचे
उस जगह आज के इन्सान गये

चिठ्ठी ना कोई संदेस जाने वो कौन सा देस – जगजित सिंघ

स्वर : जगजित सिंघ
गीतकार : आनंद बक्षी

चिठ्ठी ना कोई संदेस जाने वो कौन सा देस
जहाँ तुम चले गये
इस दिल पे लगाकर ठेस जाने वो कौन सा देश
जहाँ तुम चले गये

एक आह भरी होगी, हमने ना सुनी होगी
जाते जाते तुमने आवाझ तो दी होगी
हर वक़्त यही है गम, उस वक़्त कहाँ थे हम
कहां तुम चले गये

हर चीज पे अश्कों से लिखा है तुम्हारा नाम
ये रस्ते, घर, गलियाँ तुम्हे कर ना सके सलाम
हाय दिल में रह गई बात, जल्दी से छुडाकर हाथ
कहाँ तुम चले गये

अब यादोँ के कांटे इस दिल में चुभते हैं
ना दर्द ठहरता है ना आंसु रुकते हैं
तुम्हें ढुँढ रहा है प्यार, हम कैसे करें ईकरार
कि हाँ तुम चले गये

चाहेंगे तुझे पर कभी रुस्वा न करेंगे – तलत अझीझ

स्वर : तलत अझीझ

शायर : सईद राही

चाहेंगे तुझे पर कभी रुस्वा न करेंगे
साये से भी अपने तेरा शिकवा न करेंगे

पूछेंगे हवाओँ से घटाओँ से तेरा हाल
मिलने को तेरे वास्ते आया न करेंगे

तु मिल भी गया राह में भुले से जो मुझको
मिलने का दुबारा कभी वादा न करेंगे

जिस नाम की ताझीम किया करते हैं परदे
उस नाम को दिवार पे लिखा न करेंगे

ये हकीकत तो निगाहोँ से – जगजित सिंघ

स्वर : जगजित सिंघ
शायर : साहिर होशीयारपुरी

ये हकीकत तो निगाहोँ से बयाँ होती है
कौन कहेता है मुहब्बत की जुबाँ होती है

वो न आयेँ तो सताती है खलिश सी दिल को
वो जो आयें तो खलिश और जवाँ होती है

ये हकीकत तो….

जिंदगी ये तो सुलगती सी चिता है ‘साहिर’
शोला बनती है न ये बुझ के धुआँ होती है

ये हकीकत तो…

कभी युँ भी तो हो – जगजित सिंघ

स्वर   –   जगजित सिंघ
शायर  –  जावेद अख्तर

कभी युँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो, पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

परियोँ की महफिल हो कोई तुम्हारी बात हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

ये नर्म मुलायम ठंडी हवाएँ जब घर से तुम्हारे गुझरे
तुम्हारी खुश्बु चुराये मेरे घर ले आए
कभी युँ भी तो हो

सूनी हर महफिल हो, कोई न मेरे साथ हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

ये बादल ऐसा टूटकर बरसे
मेरे दिल की तरह मिलने को तुम्हारा दिल भी
तरसे तुम निकलो घर से

तन्हाई हो दिल हो बून्दें हो बरसात हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

कभी युँ भी तो हो
दरिया का साहिल हो, पूरे चाँद की रात हो
और तुम आओ
कभी युँ भी तो हो

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