रंजीश ही सही – मेहंदी हसन

रंजीश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ
आ फिर से मुझे छोड के जाने के लिये आ

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो-ए-राहे दुनिया ही निभाने के लिये आ

किस किस को बतायेंगे जुदाई का सबब हम
तु मुझसे खफा है तो झमाने के लिये आ

कुछ तो मेरे पिंडार-ए-मुहब्बत का भरम रख
तु भी तो कभी मुझको मनाने के लिये आ

एक उम्र से हुं लझ्झत-ए-गिरिया से भी महरूम
अय राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिये आ

– अहमद फ़राज

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